राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में पाेवार समाज के आत्मविस्मरण, आत्मजागृति एवं नयी चेतना के कालखंड (वैनगंगा क्षेत्र में आगमन से वर्तमान तक)

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लेखक /विश्लेषक - प्राचार्य आे.सी.पटले संशोधक इतिहासकार

राष्ट्र के परिप्रेक्ष्य में पाेवार समाज के आत्मविस्मरण, आत्मजागृति एवं नयी चेतना के कालखंड (वैनगंगा क्षेत्र में आगमन से वर्तमान तक)


लेखक /विश्लेषक - प्राचार्य आे.सी.पटले संशोधक इतिहासकार 


1.प्रास्ताविक


 हमारे पाेवार समाज में36 कुर समाविष्ट है!हमारे पूर्वज 300 .वर्ष पहले, सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में मालवा से नगरधन आये आैर समकालीन शासकाें काे अपने कर्म से प्रभावित करते हुए वैनगंगा क्षेत्र में स्थायी रुप से बस गये! यहाँ आने के पश्चात हमारा समाज जिस मानसिक आैर वैचारिक स्थित्यंतर से अविरत आगे बढ़ रहा है वह इतिहास युवाआें के लिए प्रेरणादायक है आैर वह इतिहास प्रमुख संकल्पनाआें के साथ निम्नलिखित है-


2.आत्मविस्मरण का अर्थ 


आत्मविस्मरण का अभिप्राय है-" मानव काे अपनी ईश्वरप्रदत्त ,नैलर्गिक अथवा जन्मत: प्राप्त आत्मशक्ति अथवा शक्ति का विस्मरण हाेना !" मानव जबतक आत्मविस्मरण की अवस्था में रहता है ,तबतक वह अपना सर्वांगिण विकास नहीं कर सकता ! इसलिए अध्यात्मवाद के अनुसार "आत्मसाक्षात्कार " अर्थात बालक की सुप्त शक्तियाें के संपूर्ण विकास काे शिक्षा का महत्वपूर्ण उद्देश्य माना गया है !


3.अध्यात्मवाद की मानव संबंधी धारणा


भारतीय अध्यात्मवाद (Spiritualism) के अनुसार मानव यह अमृत पुत्र य़ानि ईश्वर का ,सर्वशक्तिमान  परमपिता परमेश्वर का पुत्र है ! इसलिए मनुष्य में असीम शक्तिय़ाँ निहित है ! अत: अपनी आत्मिक शक्तियाें काे विकसित कर देवत्व प्राप्त करना यही मानव जीवन का परम लक्ष्य है !इसी बात काे प्राचीन यूनानी दार्शनिक सॉक्रेटिस  अपने उपदेश में "स्वयं काे पहचानाें "(Know Thy Self)  का आग्रह करता है !


4.आत्मविस्मरण  के  प्रकार 


आत्मविश्मरण जिस प्रकार व्यक्ति काे हाेता है, उसीप्रकार वह किसी जाति एवं राष्ट्र काे भी हुआ करता है  ! अत: आत्मविस्मरण के

 1.व्यक्तिगत आत्मविस्मरण

2.जातिगत आत्मविस्मरण एवं 

3.राष्ट्रीय स्तर का आत्मविस्मरण यह प्रमुख तीन प्रकार पाये जाते हैं !


5.भारतवर्ष का आत्मविस्मरण एवं राष्ट्र जागरण 


भारतवर्ष ने प्राचीन काल में सभी क्षेत्राें में देैदीप्यमान प्रगति की थी! भारत की संस्कृति -सभ्यता यह प्रचीन काल में अत्यंत उन्नत अवस्था में थी! आज भी रामायण, महाभारत जैसे ग्रंथ एवं यहाँ की एेतिहासिक- सांस्कृतिक धराेहर इसकी साक्ष्य देती है ! .किन्तु शेकड़ाे वर्ष  की मुगलाें एवं अंग्रेजाें की गुलामी के कारण भारतवर्ष अथवा भारतवासियाें काे अपनी महानता का पूर्णतः विस्मरण हाे गया था ! भारत यह " आत्मविस्मृत राष्ट्र " बन गया था !भारतियाें का स्वाभिमान एवं आत्मविश्वास यह माेतियाें की टूटी माला जैसे बिखर गये थे! 

उपर्युक्त स्थिति से भारतवर्ष काे उबारने का महान कार्य किया ! 1893 में अमेरिका के शिकागाे धर्मसंसद में हुए अपने ऐतिहासिक व्याख्यान में प्राचीन भारतवर्ष का गाैरवशाली इतिहास याद कराया! भारतवर्ष ने संसार की सभ्यता काेैनकाैनसी देन दी है, यह अपने आेजस्वी व्याख्यान में स्पष्ट किये! आैर डंके की चाेट पर उन्हाेंने बताया कि संसार काे सभ्यता का पहला पाठ भारतवर्ष ने पढ़ाया है !शुन्य का अनुसंधान भारत ने किया! अध्यात्मवाद , .वसुधैव कुटुम्बकम्  ,अहिंसा, सर्वधर्म समभाव के मानवतावादी विचार भारतवर्ष ने ही सर्वप्रथम संसार काे दिये है !वहाँ उन्हाेंने उच्च स्वर में यह भी बताया कि आत्मविस्मृत  . भारत पुन:जागेगा ! अंग्रेजाें की गुलामी से वह मुक्त हाेवेगा आैर फिर से वह अपना खाेया हुआ गाैरव प्राप्त करेगा !(मैं स्वयं भी अपने पाेवार समाज के संबंध में रात -दिन यही साेचता हूँ कि उसका खाेया हुआ गाैरव पुन: कैसे प्राप्त हाेगा!स्वामी विवेकानन्द मेरे प्रेरणास्त्राेत है !)

शिकागाे के अपने व्याख्यानाें से श्रेष्ठत्तम विद्वान एवं याेद्धा संन्यासी के रुप में स्वामी विवेकानन्द यह विश्वविख्यात हाे गये !उनकी सफलता के समाचार से साेया हुआ भारत भी जाग उठा !भारतवर्ष अपनी आत्मग्लानि से ऊबर गया! विदेश भ्रमण से वापस आने के बाद विवेकानन्द ने प्राचीन गाैरव की याद दिलाकर भारतवर्ष में नई चेतना निर्माण की आैर भारत की आजादी की नींव रखी! .महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बाेस एवं अनेक क्रांतिकारियाें ने विवेकानन्द काे अपना प्रेरणास्राेत माना है !


6.अर्जुन एवं हनुमान जी के उदाहरण 


समय -समय पर व्यक्ति, जाति अथवा राष्ट्र काे जगाने की आवश्यकता आ पड़ती है! आत्मविस्मृति के समय आत्मबाेध करानेवाले की आवश्यकता हाेती है !जांबवान ने हनुमान काे, भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन काेै एवं स्वामी रामकृष्ण ने विवेकानन्द काे आत्मविस्मरण से ऊबारा था !तब हनुमान जी ने सफलतापूर्वक माता सीता की खाेज की थी ,अर्जुन ने महाभारत के युद्ध में अलाैकिक पराक्रम दिखाया था एवं स्वामी विवेकानन्द ने विश्वमंच पर भारतवर्ष का गाैरवगान किया था !


7.पाेवार समाज के आत्मविस्मरण का कालखंड


भारतवर्ष की गुलामी के दुष्परिणाम पाेवार समाज काे भी सहने पड़े!मुगलकाल में इसी की परिणति उन्हें मालवा आैर धार छाेड़कर गाेंडवाना के नगरधन आने के रुप में हुयी थी! वे 300 वर्ष पहले, सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नगरधन आये एवं समीपवर्ती नागपुर -वर्धा के क्षेत्र में न् बसते हुये सिवनी, बरघाट, बालाघाट, गाेंदिया, तुमसर, तिराेड़ा, साकाेली इस वैनगंगा की उपजाऊ घाटी के क्षेत्र में स्थायी रुप से बस गये! 

हमारे बचपन में 1960-65 तक मालवा -राजस्थान की तरफ से केसर -कस्तुरी -शिलाजीत आैर अन्य आयुर्वेदिक आैषधि बेचनेवाले वैनगंगा तटीय क्षेत्रों में आया करते थे! वे तथा इधर गांव- गांव में अस्थायी रुप से बसे हुये ब्राम्हण लाेग बताया करते थे कि पाेवार समाज क्षत्रिय है एवं धार की तरफ से इधर बसा हुआ है! अत: केवल इतनी जानकारी हमें अपने समाज के संबंध में थी!  हम, सम्राट विक्रमादित्य राजा भरतरी, महाराजा भाेज के वंश के है, इस बात से हम अनभिज्ञ थे! तात्पर्य, हमें आत्मविस्मरण  हाे गया था! आत्मविस्मरण की अवस्था में समाज की भाषा, कला संस्कृति का पतन हाेता है! पाेवार समाज के संबंध में भी आंशिक रुप से यह बात घटित हुयी! 


8.पाेवार समाज के आत्मजागृति का कालखंड


साैभाग्य की बात है कि 1960 से 2000 तक हमारी राष्ट्रीय महासभा तथा समाज के बुद्धिजीवियों ने पाेवार वंश के इतिहास की जानकारी प्राप्त की! 1993 के बैतुल अधिवेशन में पाेवार समाज के सम्मुख राजाभाेज का आदर्श प्रस्तुत करने का प्रस्ताव पारित किया गया!यहाँ से हमारे समाज के आत्मजागृति  का नया कालखंड प्रारंभ हुआ!1993 से 2017यह इसका कालावधि है!इसके पश्चात समाज में 2018से एक नया कालखंड प्रारंभ हुआ है! यह हमारे पाेवार समाज के व्यापक वैचारिक उत्कर्ष का कालखंड है !


9.नयी चेतना अथवा व्यापक सार्वजनिक वैचारिक उत्कर्ष का कालखंड 


हमेंअपना गाैरवशाली इतिहास ज्ञात हाे चुका है! अब हमें अपने समाज में नयी चेतना का नया पर्व प्रारंभ करना है! इस पर्व में हमें अपने इतिहास का अनुशीलन करके एवं उसे सार्थक ढंग से परिभाषित करते हुये अपने समाज काे सही दिशा देनी है! हमें अपने समाज में आत्मगाैरव, स्वाभिमान, आत्मविश्वास, पुरुषार्थ आदि मनाेभाव विकसित करना है! अब हमें पुन:गाैरवशाली, वैभवशाली समाज का नवनिर्माण करना है! इसके लिए हमें अपने  समाज का वैचारिक उत्कर्ष करना आवश्क है!मातृभाषा ,कला,साहित्य,,संस्कृति,सभ्यता का उत्थान करना अनिवार्य है! उसीप्रकार हमें अपने समाज में राष्ट्रनिष्ठा, धर्मनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता आदि. गुणाें का विकास भी करना है! 


10.बुद्धिजीवि वर्ग का दायित्व 

समाजाेत्थान के लिए राष्ट्रीय महासभा एवं सभी स्तर के संगठन ताे क्रियाशील ताे है ही, किन्तु जब तक समाज का प्रबुद्ध वर्ग यह समाजहित के सजग प्रहरी के रुप में अपना दायित्व निष्ठापूर्वक नहीं निभायेगा तबतक हमारे स्वर्णिम भविष्य का सपना केवल दिवास्वप्न बनकर रह जायेगा! इसी वस्तुस्थिति काे ध्यान में रखते हुये हमने उपर्युक्त अपनी विचारधारा के अनुरूप कार्य करने की शुरुआत स्वयं से की है! हम स्वयं पँवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष तथा पँवार समाजविश्व आमूलाग्र क्रांति अभियान, भारतवर्ष के तहत साेम. 12फरवरी 2018से समाज में नयी चेतना जगाने का कार्य रात -दिन अविरत निष्ठापूर्वक करते है! हमारी विचारधारा काे संपूर्ण समाज एवं विशेषतया युवाशक्ति ने उस्फूर्त प्रतिसाद दिया है! इसके आश्चर्यजनक सुखद परिणाम भी इस वक्त देखे जा रहे है! इसके लिए हम संपुर्ण पाेवार समाज के सदैव आभारी रहेंगे. अब हमारे पाेवार समाज का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है! आत्मविस्मरण की दुखद बेला समाप्त हाे चुकी हैै!आत्मजागृति की सुखद बेला के आगे हम पहुँच गए हैं आैर अब एक नयी व्यापक सार्वजनिक चेतना का सुर्याेदय हाे चुका है !

जय श्रीराम! जय राजाभाेज !!


पँवारी भाषाविश्व नवी क्रांति अभियान, भारतवर्ष.

पँवार समाजविश्व आमूलाग्र क्रांति अभियान ,भारतवर्ष .

शुक्र. 12/06/2020

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