बैहर - परसवाडा क्षेत्र के पंवार

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सतपुड़ा की घनी वादिओं में बसा बैहर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और सौंदर्य से परिपूर्ण हैं.

सतपुड़ा की घनी वादिओं में बसा बैहर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों और सौंदर्य से परिपूर्ण हैं. ब्रिटिश सरकार ने सतपुड़ा की पहाड़ियों को चीरती हुयी सड़कों का विकास किया ताकि वें इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों का उपभोग कर सके. पूर्व में ये क्षेत्र गोंड राजाओं के अधीन थे और बाद में मराठाओं ने इन पर नियंत्रण किया. मराठाओं ने राजपूत पंवारो को कटंगी, बालाघाट, वारासिवनी और लांजी क्षेत्रों में बसाया था. मराठाओं के बाद इन क्षेत्रों पर ब्रिटिश नियंत्रण हो गया और उन्होंने बैहर क्षेत्र पर नियंत्रण के लिए राजपूत पंवारो को बैहर क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया.
बालाघाट जिले के उपायुक्त कर्नल ब्लूमफील्ड ने 1870 के आसपास पंवार राजपूतों को बैहर क्षेत्र में बसने के लिए प्रेरित किया और सर्वप्रथम श्री लक्ष्मण पंवार परसवाड़ा क्षेत्र में बसे. इसक बाद  बैहर क्षेत्र में पंवारो को कई गाँवो की पटेली/ मुक्कदमी/ जमींदारी दी गयी जो कृषि प्रधान ग्राम थे. 
बैहर मुलत: मुस्लिम बस्ती थी जहां पर मुस्लिम पटेल थे. परन्तु आज यह पंवारो की तीर्थस्थली है और आसपास के बहुत से पंवारो ने बैहर को अपना मूल निवास बना लिया हैं.
25 जनवरी  1910 को सिहारपाठ बैहर,जिला-बालाघाट में श्री गोपाल पटेल ने पंवार  समाज की बैठक बुलाई थी जहां इस पहाड़ी पर समाज के द्वारा राममंदिर बनाने का निश्चय किया गया और इस पँवार संघ के नेतृत्व में 1913 में  सिहारपाठ पहाड़ी, बैहर पर राममंदिर का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ.
बैहर नगर के आसपास करेली, खोलवा, गुराखारी, नेवरगांव, जत्ता, शेरपार, कोहका, केवलारी, गोवारी, गोहरा, भंडेरी आदि गाँवो में पंवार निवास करते है. बैहर से पूर्व की और बढ़ने पर मोहगांव, मलाजखंड से लेकर दमोह, सालटेकरी तक कई पंवार बस्तिया है जंहा बहुत बड़ी संख्या में पंवार निवास करते है जिनमे दूधी, बिरसा, बाहकल, पल्हेरा, सारसडोल, सुंदरवाही, टिन्गीपुर, बिसतवाही, बोदा, चक्रवही, भटलाई, जैटपुरी, करमसरा, पौनी, रेहँगी, शाखा, सरसडोल, चारटोला आदि हैं. बैहर से गढ़ी की तरफ पंवारो का बसाव कम हैं.
परसवाड़ा क्षेत्र सबसे ज्यादा कृषि प्रधान क्षेत्र है इसिलए परसवाड़ा से लेकर लामता, चरेगांव तक वैनगंगा नदी के पूर्वी क्षेत्रों में पंवारो का विस्तार होता गया. वैनगंगा नदी के पश्चिमी क्षेत्रों में पंवारो का बसाव मराठा काल में ही हो चुका था जो कटंगी और बरघाट के पंवारो का विस्तार था. लामता से परसवाड़ा के बीच सतपुड़ा की पहाड़िया है और पुन: परसवाड़ा का पठार है जो समतल है इसीलिए परसवाड़ा के आसपास बहुत से पंवार बहुल गॉव बसे जिसमे लिंगा, पोंडी, बघोली, चीनी,भीड़ी,भोरवाही आदि प्रमुख है. परसवाड़ा विकास खंड में डोरा के आसपास भी कुछ पँवारो के गांव हैं जिसमे अमवाई, केशा, डोहरा,फंडकी आदि प्रमुख हैं.
अरंडिया, बड़गाव, भादुकोटा, भमोड़ी, भीकेवाड़ा, चनई, चंदना, दलवाड़ा, धुरवा, दिनाटोला, जगनटोला, जैतपुरी, झिरिया, कलेगाव, कतलबोडी, लत्ता, लीलामेटा, मजगाव, मानपुर, मोहगाव, पिंडकापार, सलघट, सरेखा, सिंघई, सुकड़ी, खापा, खर्रा, खुरमुण्डी, कोसमी, कुमनगांव आदि परसवाड़ा क्षेत्र के गावों में भी बहुत बड़ी संख्या में पंवार जाति के लोग निवास कर रहे हैं.
बालाघाट की सतपुड़ा की घाटियों को पार करते ही सर्वप्रथम उकवा क्षेत्र आता है जिसके आसपास कई बड़ी पंवारो की बस्तिया है जिसमे समनापुर, रूपझर, पोंडी, सोनपुरी, दलदला आदि प्रमुख है. 
बैहर तहसील में पंवारो के बसाव के बाद यहां सर्वप्रथम उन्हें आदिवासिओं के साथ सामजस्य करना पड़ा और धीरे धीरे बैहर तहसील की छत्तीसगढ़ी-गोंडी संस्कृति के साथ घुल मिल गए. पंवारो की बोली में छतीसगढ़ी बोली के कई शब्दो का मिश्रण होता गया जिससे बैहर क्षेत्र की पोवारी बोली का स्वरुप अन्य क्षेत्रों से थोड़ा भिन्न होता गया. 
समय के साथ सतपुड़ा पर्वत ने बैहर और बालाघाट क्षेत्र के पंवारो के मध्य कुछ दूरिया भी बढ़ा दी है परन्तु सामाजिक एकीकरण के दौर और क्षत्रिय पँवार तीर्थ स्थल बैहर ने सबको फिर से एकीकरण की ओर अग्रसर किया हैं.
प्रस्तुती- ऋषि बिसेन
नागपुर

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