पोवारी लघुनाट्य - हासी मोरी सखु

Total Views : 297
Zoom In Zoom Out Read Later Print

पोवारी लघुनाट्य - हासी मोरी सखु लेखक:- डॉ. शेखराम परसरामजी येळेकर


हासी मोरी सखु


लेखक:- डॉ. शेखराम परसरामजी येळेकर


(पडदा उघडसे, घरधनी ना घरवाली झगडा क् मुडमा उभा सेती) 


घरधनी:- अव आयकसेस का? 


घरवाली:- का भयोव? तुमला त् नाहातच कामधंदा, से यन मोबाईल को वांदा. वारे वा घरधनी तुमीच

दिवसभर रवसेव वन् मोबाईल क् मंगा ना मोलाच कसेव बजावसेस पोंगा.


घरधनी:- का भयेव तव? 


घरवाली:- मी का कसु, यन् लॉकडाऊन बाहेर हिंडनो नही जम यको मतलब दिवसभर मोबाईलमाच रवनो उचित से का?  मान दुकसे, मान दुकसे कसेव, डोरा आग जरसे कसेव, डोरामालका पानी आवसे कसेव. हाय रे देवा कशी होये मोरी जिंदगानी.


घरधनी:- अव बयी, मोरी सकु, 

अशी फनफनायकन नोको देखु, 

मोर् मनमा आये तसोचत् लिखु

तोला का तकलिप से मोर् सकु


घरवाली:- मोबाईल देखनला कोन नही कसे? पन दिवसभर यको फोन, वको फोन, फोनपरा फोन. अरधो अरधो  घंटा, टुरुपोटु सोड देयात बारापर, मोबाईल क्  पायी फरक पड रही से ना तुमर् डोरापर. नंबर बी बढेव कसेव. 

टुरुपोटुपर ध्यान देनो या बात बी सेवा से का नही? सांगुसु त् आयको नही ना मोलाच कसेव बयी. तुमी मास्तर सेव, सुट्टी माबी मास्तरको कर्तव्य को पालन करणे पायजे. मोला लगसे पयले टुरुपोटु की सेवा, मंग समाजसेवा, या बात तुमर् ध्यान मा काय नही आव? यकोच बिचार आवसे. 


घरधनी:- अव तोला का समजसे? करनो पडसे समाज सेवा. 


घरवाली:- मी का नही कसु? करो समाजसेवा करो. साजरी बात से. पन सब प्रमाणमा रहे पायजे. अती वहानी माती होसे. मी तुमला सीर्फ मोबाईल सातीच कसुवु, असो नही पन टुरुपोटु का करसेत का नही यकपर ध्यान नही देनो या बात मोला हजम नही होय. 


घरधनी:- कायको आयव तोरो यव घीनघीना? तू अशीच  कसेस त् आब् पटक  देऊ यव मोबाईल, मंग लगे तोला साजरो. जा अजपासूव नही देखु मोबाईल. 


घरवाली:- अरे व्वा! धन्य देवा पांडुरंगा, मोर् घरवालला आब् सदबुध्दी देयेस. आब् त् तोला मी नारेन फोडू. 

धनी, तुमी कसेव ना त् पटको तुमर् हातको मोबाईल. मी धुमधडाका मा मोबाईल की तेरवी करु. पन असो नही होय सिक. जशी दारुड्या की दारु सुटनो मुश्किल से तसोच मोर् घरवालक हातमालक मोबाईल सुटनो मुश्किल से. 


घरधनी:- मोला असो तसो नोको समजु. मोर् सहनशीलता को अंत नोको पाहु. खरोखुरोच मोबाईल पटक देवु. 


घरवाली:- (बाल्टिमा पानी धरकन आवसे) नोको करो फालतु बात. का कर सिकसेव तुमी, तुमरी हिम्मत रहे त् यन् बाल्टीमा मोबाईल बुचकाळकन देखाव. तबच कवु का तुमला मोबाईल को नशा नाहाय. मोबाईल पटकुसु कवनो आसान से, पटकनो मुश्किल से. 


घरधनी:- (शांत स्वरमा) गलती भयी, मोर सखु, मी मोबाईल देखनो पुरो बंदत् नही करू सकु पन टुरुपोटु पर ध्यान देवु, जरासे कामधाम बी करु, यव मोरो वादा से.

 

घरवाली:- बहुत भयेव आब् वादा बिदा ना मोबाईल पुरान, सब्जीभाजी  को नहाय, आनोत् सयपाक करु नही त् नही. 


घरधनी:- आनुसुना मोरी सखु. आंबा बी आनुसु कसु  रस की इच्छा से. वक संग घीवारी बनावजोत् साजरो होये. 


घरवाली:- घर् कणिक ना फणीक अना घीवारी कसेत.

(घरधनीन् चुंगडीमा का गहु कहाडीस ना चक्कीपरलका दरस्यानी आणिस, घरवालीन् सयपाकसंगा घीवारी ना रस बनाईस.) 


घरधनी:- (घरधनीन कवन बसेव आयक मोरी कविता) 


झोऱ्या धरस्यानी मी गयेव

बजारमा आंबा लेयेव दस

घर आयेव घरवालीला कयेव

घीवारीसंग बनाव आंबाको रस

कणीक नाहाय,साखर नाहाय

अशी करन बसी टसटस

मोर् मनला कयेव मी कवन बसेव

नही भेटनको आंबाको रस


चुंगडी का गहु डब्बामा धरेव

पायलीलका मोजेव, त् भऱ्या दस

आशा मोरी मरी नोहती,

खानको होतो घीवारीसंग रस


कणीकको डब्बा टेबल पर ठेयेव

कयेव आब् नोको करु टसटस

नही बनावनो रहेत् नोको बनावु

नही पायजे मोला आंबाको रस


धरीस आंबा ना टाकीस गंजमा

वन् बनाइस आंबाको रस

घीवारीसंग मस्त जमायेव

पाचसय बटकी आंबाको रस

****

घरधनी:- कशी से मोरी कविता? 

घरवाली:- (मनक् मनमा हासकन) 

बहुतही साजरी से तुमरी कविता. 


घरधनी:- धन्यवाद (खुशीक् माऱ्या हासी मोरी सखु कयकन घरधनी नाचन बसेव.) 


(सबको घडीभरको राग शांत भयोव, सबन् हाशी खुशी आंबाक् रससंगा घीवारी खायीन. पडदा पडेव)

डॉ. शेखराम परसरामजी येळेकर.

४/६/२०२०

९४२३०५४१६०

See More

Latest Photos